एचपीयू पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पर उठे सवाल जब अंक बोलते तो अंग्रेज़ी विभाग चुप क्यों :- प्रवीन कुमार पूर्व विधायक

अनूप धीमान

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) की हालिया पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया इन दिनों अकादमिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों ने जहाँ चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का परिचय देते हुए अभ्यर्थियों के प्राप्तांक, शैक्षणिक योग्यता और चयन के मानदंड सार्वजनिक किए, वहीं अंग्रेज़ी विभाग की चुप्पी कई असहज प्रश्न खड़े कर रही है। यह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए समाज सेवा में समर्पित इन्साफ संस्था के अध्यक्ष एवं पालमपुर के पूर्व विधायक प्रवीन कुमार ने कहा जव अन्य विभागों जैसे समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति विज्ञान में यह स्पष्ट किया गया कि किस अभ्यर्थी का चयन किस योग्यता, कितने अंक और किस नियम के आधार पर हुआ। चयन सूची के साथ साक्षात्कार और अकादमिक स्कोर भी स्पष्ट रूप से दर्शाए गए । इससे न केवल पारदर्शिता बनी, बल्कि विश्वविद्यालय की साख भी मजबूत हुई। परंतु प्रश्न यह उठता है कि जब बाकी विभाग अंक तालिका दिखा सकते हैं तो अंग्रेज़ी विभाग क्यों नहीं ? इस सन्दर्भ में पूर्व विधायक से मिले अभिभावकों का कहना है क्या अंग्रेज़ी विभाग में चयन किसी ऐसे व्याकरण में हुआ है, जो न यूजीसी के पाठ्यक्रम में है और न ही विश्वविद्यालय के नियमों में ? इस पक्षपात प्रक्रिया की अकादमिक जगत में ही चर्चा जोरों पर है कि जब चयन के मापदंड समान थे, तो एक ही विश्वविद्यालय में अलग-अलग विभागों के लिए अलग नियम कैसे लागू हो सकते हैं ? क्या योग्यता अब केवल विषय नहीं, बल्कि सुविधा का प्रश्न बन गई है ? पूर्व विधायक ने कहा सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस विभाग से भाषा, विवेक और अभिव्यक्ति की अपेक्षा की जाती है, वहीं उसमें आज सबसे अधिक अभिव्यक्ति का अभाव दिखाई दे रहा है। इस गम्भीर विषय को माननीय मुख्यमन्त्री श्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू ओर खासकर शिक्षा मन्त्री श्री रोहित ठाकुर जी के ध्यानार्थ लाते हुए पूर्व विधायक ने कहा अव यहाँ व्यंग्यकारों का ही कहना है कि शायद अब अंग्रेज़ी साहित्य नहीं, बल्कि ख़बर लिखने व बोलने की कला का विषय बन गया है । क्योंकि कुछ प्राध्यापक ऐसे भी बताए जा रहे हैं, जिनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि पत्रकारिता से जुड़ी रही है, पर वे अंग्रेज़ी साहित्य के भविष्य का निर्णय कर रहे हैं । यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या साहित्य की कसौटी अब भाषा और आलोचना नहीं, बल्कि हेडलाइन और कॉलम बन गए हैं? पूर्व विधायक ने कहा विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केवल डिग्री नहीं, बल्कि न्याय और बौद्धिक ईमानदारी भी प्रदान करे। यदि चयन प्रक्रिया पर संदेह के बादल मंडराते रहे, तो इसका असर केवल अभ्यर्थियों पर नहीं, बल्कि पूरी अकादमिक परंपरा पर पड़ेगा। अव समय आ गया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन यह स्पष्ट करे चयन किस नियम से हुआ, किस आधार पर हुआ और क्यों कुछ विभागों में नियम दिखाए गए, जबकि कुछ में छिपा लिए गए। क्योंकि जब सवाल अंग्रेज़ी विभाग पर उठते हैं, तो गूँज केवल शब्दों की नहीं, संस्था की आत्मा की होती है।

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Author: Khabar Himachal

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